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Friday, August 27, 2010

ZINDAGI

मैं दो कदम चलता और एक पल को रुकता मगर........... ♡ इस एक पल जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ जाती । ♡ मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और.... ♡ जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती । ♡ युँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और.... ♡ जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती । ♡ ये सिलसिला यहीं चलता रहता..... ♡ फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पुछा.......... ♡ " तुम हार कर भी मुस्कुराते हो ! क्या तुम्हें दुख नहीं होता हार का ? " ♡♡ तब मैंनें कहा................ ♡ मुझे पता हैं एक ऐसी सरहद आयेगी जहाँ से आगे ♡ जिन्दगी चार कदम तो क्या एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी, ♡ तब जिन्दगी मेरा इन्तज़ार करेगी और मैं...... ♡ तब भी युँ ही चलता रुकता अपनी रफ्तार से अपनी धुन मैं वहाँ पहुँगा....... ♡ एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउगा.......... ♡ बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाँउगा। ♡ ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउगा......... ♡ मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और अपनी जीत पर भी...... ♡ मगर जिन्दगी अपनी जीत पर भी ना मुस्कुरा पाई थी और अपनी हार पर भी ना रो पायेगी"

2 comments:

  1. Kya Baat hai babu moshai..
    Kya bola hai....

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  2. bola to kisi aur ne hai...
    maine to sirf pesh kiya hai....

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